दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सायरिल रामाफोसा 26 जनवरी के परेड के चीफ गेस्ट होंगे. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के गणतंत्र दिवस पर निमंत्रण अस्वीकार करने के बाद भारत एक ऐसे देश की ओर देख रहा था जिसका रणनीतिक और प्रतीकात्मक महत्व हो.
सायरिल रामाफोसा को इस वजह से भी निमंत्रण दिया गया है क्योंकि इसी साल राष्ट्रपति महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मनाई जाएगी. सायरिल रामाफोसा को गांधी और दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला का समर्थक माना जाता है.
बता दें कि डोनाल्ड ट्रंप ने गणतंत्र दिवस पर भारत का निमंत्रण अस्वीकार कर दिया था. ट्रंप ने भारत ना आ पाने के लिए 26 जनवरी के आसपास अपनी व्यस्तता को वजह बताया था. माना जा रहा कि ट्रंप का स्टेट ऑफ यूनियन को संबोधन मुख्य वजह है, जो कि 22 जनवरी से फरवरी के पहले सप्ताह के बीच हो सकता है.
ट्रंप को यह निमंत्रण पीएम मोदी के 2017 के अमेरिकी दौरे पर दिया गया था. 75 वर्षीय जैकब जुमा के इस्तीफे के बाद 65 वर्षीय नेता सायरिल रामाफोसा को इसी साल अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (एएनसी) का नया अध्यक्ष चुना गया था. फरवरी में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति पद की शपथ ली.
सायरिल रामाफोसा प्रवासी भारतीय दिवस समारोह में भी हिस्सा लेंगे. बता दें इस साल प्रवासी भारतीय दिवस वाराणसी में मनाया जाएगा.
देश में रोजगार नीति की सबसे बड़ी विडंबना है कि बीते एक दशक के दौरान देश में आर्थिक विकास की दर लगातार तेज हो रही है और रोजगार के आंकड़े गंभीर स्थिति में जा रहे है. जहां वैश्विक स्तर पर अर्थशास्त्री इसे जॉबलेस ग्रोथ कह रहे हैं, रोजगार की समस्या मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है.
ऐसी स्थिति में ये सरकार की बेसब्री का नतीजा ही है कि हाल में दिए एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दावा किया कि जब सड़क के किनारे युवा पकौड़े बेचकर 200 रुपये प्रतिदिन कमा रहा है तो इसे रोजगार सृजन कहने की जरूरत है.
बहरहाल, बीते दो दशक के दौरान देश में नई नौकरियां पैदा करने में महारत साबित करने वाले आईटी कंपनी इंफोसिस के को-फाउंडर एन आर नारायणमूर्ति ने अगले दशक में नौकरी सृजन करने का मंत्र मोदी सरकार को दिया. ब्लूमबर्ग को दिए इंटरव्यू में नारायणमूर्ति ने कहा कि मोदी सरकार को चाहिए कि वह देश में कारोबारी के लिए अच्छे दिन लाने के साथ-साथ दुनियाभर से कारोबारियों को निवेश लाने का काम करें.
नारायणमूर्ति ने कहा कि मौजूदा वैश्विक चुनौतियों के बीच यदि देश की सरकार नौकरियों के सृजन को गंभीरता से लेना चाहती है तो उसे इन दो पक्षों पर इमानदारी से काम करने की जरूरत है.
गौरतलब है कि बीते डेढ दशक के दौरान जहां अर्थव्यवस्था 7 फीसदी से अधिक की रफ्तार से आगे बढ़ रही है वहीं रोजगार के आंकड़े इस दौरान 2.87 फीसदी के दर से लुढ़ककर 1 फीसदी से भी कम के स्तर पर पहुंच गया है.
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